तेजिंदर के उपन्यासों में दलित विमर्श

संजू साहू1 डा- रमेश अनुपम2

1हिंदी एवं भाषा साहित्य अध्ययन विभाग, शासकीय दू-- महिला स्नाताकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय रायपुर (छ ग

2सहायक प्राध्यापक, शासकीय दू-- महिला स्नाताकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय] रायपुर (छ ग

 

 स्तावना

उपन्यास आज वर्तमान समकालीन साहित्य में सबसे प्रिय सशक्त विधा है] उपन्यास लेखन] कला शिल्प का उत्कृष्ट रूप है उपन्यास हमारी कल्पनाजन्य संस्कृति का सबसे बड़ा उपहार है। यथार्थपरक हिन्दी साहित्य की चर्चा हो और तेजिंदर का नाम ना आए तो हिन्दी साहित्य का उपन्यास अपूर्ण कहलायगा।

 

उन्होनें अपने उपन्यासों में इन सभी यथार्थ परक विषयों का कुशल निर्वहन किया है। आदर्शवादी उपन्यासकार भी यथार्थ की अवहेलना नहीं कर सकता]उसका आदर्श यथार्थ की भूमि पर ही पललवित होता है। ऐसे ही तेजिंदर के दो दलित उपन्यास है जिसकी यथार्थता चीखते हुए हमसे अनगिनत सवाल करनी है। जिसमें तेजिंदर ने अपने उपन्यास के माध्यम से कथ्यों को उद्रधृत किया है।

 

तेजिंदर के समक्ष चलते फिरते ये दलित यथार्थपरक पात्रों को इन्होनें कुशलता से उपन्यास के कलेवर में पाठकों के समक्ष बिना किसी हेर-फेर के प्रस्तुत किया है। ‘‘उस शहर तक’’ और ‘‘हैलो सुजीत’’ तेजिंदर की दलित पृष्ठभूमि पर रचित ऐसे सशक्त उपन्यास है जो रह रहकर हमसे पूछती है चीखती है चित्कारती है और सवाल करती है कि ‘‘आखिर हम ही क्यों’’ तेजिंदर के अपने इन दोनों अद्भुत उपन्यास दलित विमर्श के लिए एक मील का पत्थर हैं जिसमें उसके पात्रों के भाव इन उपन्यासों की आत्मा है। इनके ये उपन्यास] उपन्यास की बनी बनाई परिपाटी पर कटाक्ष करते है। जिससे ‘‘हैलो सुजीत’’ ‘‘उस शहर तक’’ उपन्यासों मे ंएक बोल्डनेस का पुट प्रतिबिंबित होता है तेजिंदर ने उपन्यास की मौलिकता को बरकरार रखते हुए भावनात्मक और नवीनता से दलित साहित्य में अपनी जो विशेष उपस्थिति दर्ज करायी है। उसके लिए तेजिंदर का नाम सदा श्रेष्ठता से लिया जायेगा। उपन्यास आज वर्तमान समकालीन साहित्य में सबसे प्रिय सशक्त विधा है] उपन्यास लेखन] कला शिल्प का उत्कृष्ट रूप है उपन्यास हमारी कल्पनाजन्य संस्कृति का सबसे बड़ा उपहार है।

यथार्थपरक हिन्दी साहित्य की चर्चा हो और तेजिंदर का नाम ना आए तो हिन्दी साहित्य का उपन्यास अपूर्ण कहलायगा। तेजिंदर ने सामाजिक यथार्थवाद दलित विमर्श] भ्रष्टाचार] नस्लभेदी] धर्मान्तरण साप्रदायिकता] आतंकवाद] जातपात] छुआछुत] शोषण इन सभी विषयों जो कि गंभीर है पर यह कठोर सत्य है कि हमारा देश आज भी प्रगतिशीलता के इस दौर में भी इन्ही उलझनों में लिपटा हुआ है। ये सभी विषय और उसके पात्र हमारे आसपास चलते फिरते महसूस किए जा सकते है। बस चाहिए तो तेजिंदर की तरह पैनी निगाह और साथ में संवेदना का संस्कार। उन्होनें अपने उपन्यासों में इन सभी यथार्थ परक विषयों का कुशल निर्वहन किया है। आदर्शवादी उपन्यासकार भी यथार्थ की अवहेलना नहीं कर सकता]उसका आदर्श यथार्थ की भूमि पर ही पललवित होता है। ऐसे ही तेजिंदर के दो दलित उपन्यास है जिसकी यथार्थता चीखते हुए हमसे अनगिनत सवाल करनी है। जिसमें तेजिंदर ने अपने उपन्यास के माध्यम से कथ्यों को उद्रधृत किया है। तेजिंदर के समक्ष चलते फिरते ये दलित यथार्थपरक पात्रों को इन्होनें कुशलता से उपन्यास के कलेवर में पाठकों के समक्ष बिना किसी हेर-फेर के प्रस्तुत किया है। ‘‘उस शहर तक’’ और ‘‘हैलो सुजीत’’ तेजिंदर की दलित पृष्ठभूमि पर रचित ऐसे सशक्त उपन्यास है जो रह रहकर हमसे पूछती है चीखती है चित्कारती है और सवाल करती है कि ‘‘आखिर हम ही क्यों’’ तेजिंदर के ये दोनों दलित उपन्यास कस्बे] शहर] महानगर के उस भयानक रूप का प्रदर्शन करते है जो संवेदनहीनता असमानता शोषण को और ज्यादा सहायता करते है। पोषक करते है। तेजिंदर के इन उपन्यासों में दलित मानवता की चित्कार है। जहां प्रथम उपन्यास ‘‘उस शहर तक’’ की बात है ंजिसमें समसामयिक समाज का अंर्तद्वंद] वीभत्सता] मनुष्य के प्रति घृणा] आक्रोश और असंतोष का जीवंत दस्तावेज है। तो दूसरे महत्वपूर्ण सशक्त उपन्यासहैलो सुजीत में उच्चपदासीन दलित महिला को किसी तरह से सामाजिक विसंगतियों लिंगभेद का सामना घर और बाहर दोनों जगह करना पड़ता है। ये दिखाया गया है। उपन्यासकार तेजिंदर ने हैलो सुजीत को इतने कसाव से प्रस्तुत किया है कि उसकी गंभीरता सार्थकता संवेदना हमें झकझोर देती है। दोनों उपन्यासों में दलित चरित्र दांव पर लगे है और रचनाकार ने कहीं भी पात्रों केा अकेला नहीं छोड़ा है। ‘‘उस शहर तक’’ के पीलादास उर्फ गिरीश कुमार ‘‘हैलो सुजीत’’ की कुमुद महेश खोब्रागड़े का साथ तेजिंदर ने कही भी बिना पलायन करते हुए उसे एक उंचाई तक पहुंचाया है। ये दोनों उपन्यास तेजिंदर ने नए] रोचक ढंग से सफलता पूर्वक पाठकों के समक्ष रखे है।

 

तेजिंदर के ये दोनों उपन्यास परंपरागत उपन्यासों से अलग यथार्थपरक और सपाटबयानी है] और इस उपन्यास के दलित पात्र दलित पृष्ठभूमि] दलित दशा दिशा सामाजिक असमानताओं को मिटाकर समाज में एक मिशाल कायम करते है। प्रेमचंद की उपन्यास प्रेमाक्षय] रंगभूमि] कर्मभूमि] गोदान] पांडेय बैचेन शर्मा ‘‘उग्र’’ की बुधुआ की बेटी] सुर्यकांत त्रिपाठी निराला की ’’कुल्लीभाट] चतुरशेन शास्त्री की गोली ओर गुलाब उदयारत रांगेय राघव की कब तक पूकारूं] उदयश्शंकर भट्ट की सागर] नहरे और मनुष्य] फणीश्वरनाथरेणु की मैलाअंाचल परती परिकथा] भैरपप्रसाद गुप्ता की सती मैया का चैंरा मन्नु भंडारी की महाभोज] भीष्म साहनी की बसंती राहुल सांकृत्यायन की सिंह सेनापति] जययौधव वृंदावन लाल वर्मा की मृगनयनी चतुरसेन शास्त्री की सोमनाथ वयं रक्षाय] प्रेम कपाडिया की माटी की सौगंध] हजारी प्रसाद द्विवेदी की वाणभट्ट की आत्मकथा इन सभी उपन्यासों के माध्यम से समकालीन दलित दशा स्पष्टतः उभर कर आती है। इनके माध्यम से दलित मानवीयता चीखते हुए अपने उपर हुए अनाचार] छुआछुत] अव्यवस्था] शोषण अत्याचार को स्पष्टतः बया करती है।

        ‘‘दलित जीवन के यथार्थ की पड़ताल करे तो हम पाते है तो कि दलित संस्कृति कभी भी अलगाववादी नहीं रही] इसलिए दलित सस्कृति ही सही मायने में भारत की जनसंस्कृति रही है।’’

 

तेजिंदर ने भी अपने दोनों उपन्यासों के माध्यम से जहां एक ओर दलित पुरूष पीलादास चमार] उर्फ गिरीश कुमार के अंतद्र्वद की दधा को प्रस्तुत किया है। वहीं दूसरी उपन्यास में स्त्री केन्द्रीत भूमिका में दलित महिला कुमुद के घर बाहर के विसंगतियों और चुनौतियों को उकेरा है।

 

1997 में प्रकाशित उस शहर तक में दिखाया गया है कि चाहे छोटे शहर हो महानगर दलित व्यक्ति के प्रति सोच मानसिकता वैसे ही बनी रहती है बल्कि अभिजात्य वर्ग के द्वारा दलित वर्ग पर की गई टिप्पणी और ज्यादा पीड़ाशील होती है। उस शहर तक का केन्द्रीय पात्र पीलादास जो कि चमार दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है उसके साथ ही स्कूल में भी उसे पीलादास चमार के नाम से पुकारा करते थे] पर नेकविचारशील शिक्षक आसना सर जो कि भविष्य को भी अच्छे तरीके से नापते थे पीलादास की महत्वकांक्षा का आंकलन करते हुए उसका नाम कचहरी तक में गिरीश कुमार करवा देते है। पीलादास के पिता जी स्वयं रेल्वे में कर्मचारी थे] वो अपने अतीत को कभी नहीं भूले और चाहते थे कि किसी भी हालत में उन्होंने जो कुछ भी झेला है वह उसके पुत्र पीलादास को झेलना पड़े। स्वालंबी पढ़ाई में होशियार पीलादास उर्फ गिरीश कुमार का मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग के तहत सहायक पंजीयक पद में चयन हो जाता है। जिसकी ट्रेनिंग हेतु उसे दिलवालों का शहर दिल्ली जाना होता है। एक राजपत्रित अधिकारी होने के बाद भी दलित होने का दम्भ उससे पीछा नहीं छोड़ता] दिल्ली के पाॅश इलाके उच्चवर्गी सेठी परिवार में उसे गिरिश कुमार के नाम से पेइंगगेस्ट की तरह रहने हेतु जगह मिल जाती है। पर हर रोज गिरीश कुमार को सेठी परिवार और उनके मित्रों से अनजाने में ही सही दलित शब्द के गाली के तौर पर खानी होती है। पीलादास ये सोच में रह जाता है कि इन लोगों में दूर-दूर तक इंसानियत नहीं है] दलाली के पैसें को मानते है और मेहनत] मजदूरी] पाककमाई के पैसे को शक] नफरत और कड़वाहट से देखते है।

        ‘‘उसे लगा जैसे वह खुद अपने ही खिलाफ खड़ा हुआ है उसका इस्तेमाल स्वयं उसके खिलाफ किया जा रहा है।’’

 

पीलादास के सिर्फ एक नाम परिवर्तन से ही वह दलित से अभिजात्य ब्राम्हण बन जाता है किन्तु उसकी यह विवशता उसके अंतर्मन को बदल पाती है तोड़ पाती है। बल्कि उसे हर क्षण दलित कहलाने को उत्प्रेरित करती है। पीलादास चमार के माध्यम से रचनाकार ने एक युवा दलित का ही नहीं अपितु समस्त कौम की व्यथा का चित्रण किया है। गौर करने वाली बात है कि दिल्ली जैसे महानगर में उच्च अभिजात्य वर्ग] बुद्धिजीवी वर्ग भी कोई अलग नहीं वो भी सोच से घुटनाश्शील है रक्त उनका इंसान के लिए सफेद हो चुका है] भवनाएं मृतप्राय हो चुकी है। यह निश्चय ही हम कह सकते है कि पीलादास उर्फ गिरीश कुमार के माध्यम से तेजिंदर ने समसामायिक समाज के अन्तद्र्वद के  पीड़ा] आक्रोश और असंतोष को एकदम गंभीरता से पाठको के समक्ष रखा है। ये उपन्यास समाज के उन कुरितियों पर कुठाराघात प्रहार करती है जिसने इंसान को सामान्य इंसान बने रहने नहीं दिया है अंत में पीलादास का यह कहना कि

        ‘‘तुम मुझे ब्लेकमेल कर रहे हो तो सुनो उस मुच्छड़ सेठी से यह भी बता देना कि मैं चमार] मेरा बाप चमार और मेरा दादा चमार और मेरा असली नाम पीलादास चमार और यह भी बता देना कि मैने उनके बारे में सारा सच जान लिया है और यह भी की दरअसल वे बहुत डरे हुए लोग है और यह भी कि वह डिप्रेशन के मरीज है और यह भी वे बहुत झूठे है। जितना मजबूत आवरण उन्होंने अपने आस-पास बड़ा करने का भ्रम पाल रखा है उनका वह भ्रम भी हमारी समज में गया है।’’ दरअसल पीलादास चमार हमारी सामाजिक व्यवस्था की कि एक उपज है और इसी सामाजिक व्यवस्था के चलते उसे निरंतर समाज के उस संगठित सी खोखली दिखने वाली गिरोह से उलझना] जुझना पड़ता है जिनके हाथों सर्वाधिकार है।

 

        ‘‘दलित उपन्यास ग्राम] शहर और सम्पूर्ण भारत वर्ष के उसे हेय रूप का वर्णन करते है जो असमानता का पोषक और शोषण का सहायक है] दलित कहने की तेजी की अपेक्षा दलित उपन्यास शनै-शनै सामाजिक विभेद को करीने से प्रस्तुत करते है उसे वैचारिक मंथन देकर एक निर्णयकारी लक्ष्य की ओर ले जाते है। इन उपन्यासों में मानवता की चीख है] शोषण से उपज आर्तनाद है तथाकथित शरीफ सवर्णो की कृतिम करूणा और बनावटी दया का उद्रेक है।’’

 

तेजिंदर की दूसरी अमूल्य कृति नारी केन्द्रित हैं सोच सकते है स्त्री उपर से दलित तो कितनी मजबूत पृष्ठभूमि होगी उपन्यास की। बहुत से उपन्याकार हैं जिन्होंने दलित स्त्री की जीवन शैली संघर्ष शोषण उनके मर्म को पहचानते हुए अपना साहित्य रचा उनमें तो कई उपन्यास ऐसे है जो अंततः ये साबित करते है। मानों वे स्त्री दलित के दर्द को मौन स्वीकृति प्रदान कर रहे हों आधुनिक युग में दलित स्त्रीयों ने प्रगति की है तो उसमें हाथ उन्हीं दलित स्त्रीयों का है जैसा की तेजिंदर ने अपने उपन्यासहैलो सुजीत में कुमुद खोब्रागड़े को दिखाया है। जिसमें सुजीत कुमुद का चैदह साल का बेटा है जिसे ‘‘स्पांस्टिक’’ नामक बीमारी है। कुमुद खोब्रागड़े उच्चपदासीन दलित महिला है जो कि महाराष्ट्र के सूचना विभाग में संयुक्त निदेशक पद पर काबिज थी। इतने बडे़ ओहदे में होने के बाद भी कुमुद की घर में स्थिति बिल्कुल उस सामान्य महिला की तरह थी जो रोज शाम अपने निकम्मेें पति का अत्याचार झेलती थी और कार्यालय में अपने नीचे काम करने वाले कर्मचारियों की ताने फब्तियां सुनती थी।

 

        ‘‘यह आग से जलती हुई लकड़ी की मार के निशान है। मेरे सास-ससुर मुझे महेश ओब्रागड़े के सामने यों मारा करते थे और वह चुपचाप बैठकर देखता रहता था घुग्गुओं की तरह’’ इस उपन्यास में कुमुद का चरित्र यह बताता है कि नारी के प्रति परंपरागत मानसिकता में अंतर ना पहले आया था ना अभी। वो अभद्रता] अपमान] अत्याचार] शोषण आज भी बनी हुइ्र है बल्कि इसका सारा दोष भी उसे ही दिया जाता हैं।

      

कुमुद के पति महेश खोब्रागड़े जो कि शराबी और निकम्मा है उसका यह तर्क देना

        ‘‘चूंकि मैने तुम्हें घर के किसी कमरे में बंद करके नहीं रखा इसलिए तुम पढ़ सकी और आज अच्छी नौकरी पर मेरा हक बनता है ‘‘तुम्हें पता है जब जब मेरी प्रमोशन होनी है तो सिर्फ दफ्तर के लोगों की आंखे ही नहीं बदलती घर पर महेश खोब्रागड़े भी अश्लील हरकतें करने लगता है] कहता है मैं क्लास वन गजेटेड आफिसर पर चढ़ता हंॅू’’

 

उपन्यास की नायिका निडर है उसे अपने दलित होने पर किसी प्रकार का क्षेाभ नहीं है। उसे एक दलित होने की त्रासदी उसके पुर्वजों ने बताया है कि उनक साथ क्या क्या] अत्याचार हुए थे। और ये सब बेबाकी से कुमुद अपने बहुत ही करीबी सर्वण मित्र सत्यम को इस बात से अवगत कराती है।

 

        ‘‘और फिर हमारी अलग पहचान हुआ करती थी। दादी बताती थी कि हम लोग सड़क पर खाली हाथ नहीं चल सकते थे। हमारे सिर पर काली मटकी होती थी।’’ ‘‘क्यों’’

‘‘मटकी थूकने के लिए क्योंकि हम उनकी सड़क पर थूक नहीं सकते थे और झाडू इस बात के लिए कि जब हम चले तो उनके लिए रास्ता साफ करते हुए चलें।।’’

 

कुमुद का यह कहना यह साबित करना है कि वह शोषित होने के बाद भी एक सम्यक क्रांति की अगृसर है। इस उपन्यास में की रचनाकार तेजिंदर ने दलित स्त्री कुमुद की पीड़ा मर्म को समझते हुए उसे ख्याति] सामाजिक सम्मान और बराबरी प्रदान करने की हर संभव कोशिश की है। इसके लिए कुमुद को बहुत जलील होना पड़ा।

 

        ‘‘संध्या और मिसेज खुराना की बातांे की प्रतिध्वनी उस पूरे कमरे में फैल रही थी जिस तरह किसी फिल्म के पर्दे पर होता है एक ही दृश्य एक ही आवाज बार बार हर बार’’ वो वहीं नीचे फर्श पर लुड़क गयी थी। इस समय दोपहर के तीन बजे थे। बाहर तेज बारीश हो रही थी। भारी बारिश की आवाज मे ंभी उन्हें एक ही शब्द बार-बार सुनाई दे रहा था - चमरिया चमरिया चमरिया‘‘

 

इतने महत्वूपर्ण विषय को लेकर तेजिंदर ने जो सामाजिक विसंगतियों को सहज स्वीकार करते हुए उपन्यासों की रचना कर पाठकों के समक्ष रखा ऐसा बिरले ही कर पाते है।

 

पूरे उपन्यास में एक चीख हमेशा हमारे कानों में सुनाई पड़ती है। कह कसते है कुमुद सीधे सीधे पाठको से पूछती है। कि ‘‘यह नियम कौन बनाता है?’’ और उसकी दारूण परिस्थितियों के बीच निकली यही चित्कार पाठक के मन को विचलित कर देता है। कई बार दलित साहित्य लिखते लिखते रचनाकार  पात्र को अकेला कर परिस्थिति के साथ हो चलता है। पर तेजिंदर ने कठिन से कठिन परिस्थिति के बीच भी पात्रों को अकेला नहीं छोड़ा है। अंततः वह उसके साथ बने रहते है। अपने दलित विमर्श को बड़ी ही रोचकता ओर कुशलतापूर्वक पाठकों के समक्ष रखने में तेजिंदर  ने कोई भी चूंक नहीं की ना ये कभी प्रतिक्रिया से पलायन किए एवं गैर दलित उपन्यासकार होने के पश्चात भी तेजिंदर ने बड़ी ही मार्मिकता के साथ पीलदास और कुमुद खोब्रागड़े के किरदार को जीवंत स्वरूप प्रदान किया है जो एक दस्तावेज के रूप में सुरक्षित रहेंगे।

        ‘‘माता प्रसाद के अनुसार दलित साहित्य यथार्थ पर आधारित है और यह मुक्त भोगियों का साहित्य है इसमें इस द्वंद ओर अलंकार की परवाह नहीं की जाती है।’’

 

अतः यह कहा जा सकता है कि तेजिंदर के अपने इन दोनों अद्भुत उपन्यास दलित विमर्श के लिए एक मील का पत्थर हैं जिसमें उसके पात्रों के भाव इन उपन्यासों की आत्मा है। इनके ये उपन्यास] उपन्यास की बनी बनाई परिपाटी पर कटाक्ष करते है। जिससे ‘‘हैलो सुजीत’’ ‘‘उस शहर तक’’ उपन्यासों मे ंएक बोल्डनेस का पुट प्रतिबिंबित होता है तेजिंदर ने उपन्यास की मौलिकता को बरकरार रखते हुए भावनात्मक और नवीनता से दलित साहित्य में अपनी जो विशेष उपस्थिति दर्ज करायी है। उसके लिए तेजिंदर का नाम सदा श्रेष्ठता से लिया जायेगा।

 

संदर्भ ग्रंथरू

1ण्       डाॅ. मीणा श्रवण कुमार] दलित साहित्य और समसामयिक संदर्भ] संजय प्रकाशन] नई दिल्ली] संस्करण प्रथम 2009] पृष्ठ 43

2ण्       तेजिंदर] उस शहर तक] ज्ञान भारती] नई दिल्ली] प्रथम संस्करण 1997] पृष्ठ 38

3ण्       तेजिंदर] उस शहर तक] ज्ञान भारती] नई दिल्ली] प्रथम संस्करण 1997] पृष्ठ 108

4ण्       डाॅ. मीणा श्रवण कुमार] दलित साहित्य और समसामयिक संदर्भ] संजय प्रकाशन] नई दिल्ली] संस्करण प्रथम 2009] पृष्ठ 61

5ण्       तेजिंदर हैलो सुजीत] भारतीय ज्ञान पीठ] नयी दिल्ली] प्रथम संस्करण 2003] पृष्ठ 42

6ण्       तेजिंदर हैलो सुजीत] भारतीय ज्ञान पीठ] नयी दिल्ली] प्रथम संस्करण 2003] पृष्ठ 62

7ण्       तेजिंदर हैलो सुजीत] भारतीय ज्ञान पीठ] नयी दिल्ली] प्रथम संस्करण 2003] पृष्ठ 77

8ण्       तेजिंदर हैलो सुजीत] भारतीय ज्ञान पीठ] नयी दिल्ली] प्रथम संस्करण 2003] पृष्ठ 56

9ण्       प्रसाद माता]  उत्तरप्रदेश पत्रिका] दलित विशेषंक 2002] पृष्ठ 64

 

 

 

 

 

 

Received on 10.02.2017          Modified on 15.03.2017

Accepted on 20.03.2017         © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2017; 5(1): 19-23.

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